बुल्डोजर माफिया पर चल रहा है शिक्षा माफिया पर कब चलेगा
योगी आदित्यनाथ। नाम ही काफी है। पाकिस्तान की आवाम चुपके से कहती है "काश हमारा भी ऐसा हुक्मरान होता"। जापान वाले स्टडी करने आते हैं, सिंगापुर वाले नोट बनाते हैं, अमेरिका वाले ट्वीट करते हैं, रूस वाले तारीफ करते हैं। भारत के हर प्रदेश से आवाज आ रही है "हमारे यहां भी योगी भेज दो"।
क्यों भेज दो? क्योंकि बुल्डोजर चलता है। माफिया मिट्टी में मिलता है। टांग पर गोली चलती है। अपराधी का एनकाउंटर होता है। अवैध कब्जे ध्वस्त होते हैं। प्रशासन का डंका बजता है। स्वच्छ छवि है, 24 घंटे काम है, आंख में आंख डालकर बात है। मान गए। सलाम है।
पर गिद्ध की नजर सिर्फ सड़क पर नहीं जाती। गिद्ध आसमान से पूरा नक्शा देखता है। और नक्शे में एक जगह काला धब्बा दिखा। वो धब्बा है स्कूल का गेट। कॉलेज का कैंपस। कोचिंग का बोर्ड।
वहाँ दूसरा माफिया राज कर रहा है। ये माफिया बंदूक नहीं रखता। ये माफिया सूट-बूट पहनता है। टाई लगाता है। AC गाड़ी में चलता है। नाम है इसका "शिक्षा माफिया"। और इस माफिया पर आज तक बुल्डोजर नहीं चला।
गांव की कहावत है "जितना अन्हरू बरत जायं, उतना पंडरू चरत जांय"। जितनी रोशनी फैलेगी, उतनी परछाई भी निकलेगी। रोशनी तो बहुत फैल गई। परछाई सबसे काली उसी जगह है जहाँ से देश का भविष्य निकलता है - क्लासरूम से।KG में बच्चे का दाखिला कराओ तो फीस। LKG में प्रमोट हुआ तो फिर फीस। UKG में गया तो फिर फीस। पहली क्लास में पहुंचा तो एडमिशन फीस। दूसरी में गया तो डेवलपमेंट फीस। तीसरी में पहुंचा तो बिल्डिंग फीस। हर साल नया बहाना, हर साल नई रसीद। बाप की जेब कट रही है और स्कूल का मालिक हंस रहा है।
किताब का हाल देखो। हर साल किताब बदल दो। प्रकाशक की लॉटरी लग गई। एक साल पुरानी किताब रद्दी के भाव। पहले ऐसा नहीं था भैयाजी। पहले कक्षा बदलती थी, किताब नहीं बदलती थी। बड़ी दीदी की किताब छोटा भाई पढ़ लेता था। कवर फट जाता था, पन्ने मुड़ जाते थे, पर ज्ञान नया रहता था। आज ज्ञान पुराना हो जाता है, पर फीस नई मांगते हैं।
बोर्ड इतने हो गए हैं कि बाप-बेटा दोनों पागल हो गए हैं। CBSE कराएं, ICSE कराएं, UP Board कराएं, IB कराएं, Cambridge कराएं। हर बोर्ड की अपनी दुकान, अपना कमीशन, अपना ड्रेस, अपना बैग, अपने जूते। गरीब बाप क्या करे? वो तो बस इतना जानता है कि बेटा पढ़ जाए। पर पढ़ाई की दुकान इतनी महंगी हो गई कि बाप ही अनपढ़ रह गया हिसाब लगाते-लगाते।
पांचवी क्लास तक का खर्चा जोड़ लो तो रूह कांप जाएगी। जितना पैसा आज पांचवी के बच्चे पर लग रहा है, उतने में पहले हमारा बाप MA, LLB कर लेता था। वो भी हॉस्टल में रहकर। आज नर्सरी का बच्चा राजा है और बाप उसका गुलाम है EMI का।
इंजीनियरिंग कॉलेज खोल दो। मेडिकल कॉलेज खोल दो। प्राइवेट यूनिवर्सिटी की बाढ़ ला दो। हर गली में कॉलेज, हर मोड़ पर यूनिवर्सिटी। कैंपस सिलेक्शन के नाम पर लूट मची है। 20 लाख फीस लो, प्लेसमेंट के नाम पर 4 लाख का पैकेज दिखाओ। बच्चा 16 लाख का कर्ज लेकर निकलता है। कोटा देखो। दिल्ली देखो। कोचिंग की फैक्ट्री लगी है। किसान जमीन बेच रहा है, जेवर बेच रही है मां, और बेटा कोटा में कमरे में बंद है। 16 घंटे पढ़ाई। खाना भूल गया, नींद भूल गया, बचपन भूल गया। और उधर से खबर आती है "छत से कूद गया"। किसान का कर्ज माफ नहीं हुआ, पर किसान का बेटा माफ हो गया इस दुनिया से।
पेपर लीक हो रहा है। नीट का पेपर, यूपी पुलिस का पेपर, एसएससी का पेपर। मेहनती लड़का रात-रात भर जागकर पढ़ रहा है और जुगाड़ू लड़का 10 लाख देकर पेपर खरीद रहा है। फिर वो कॉकरोच की तरह सिस्टम में घुस रहा है। ईमानदार बाहर खड़ा है, बेईमान कुर्सी पर बैठा है। माफिया मिट्टी में मिल रहा है, बहुत अच्छी बात है। एनकाउंटर हो रहा है, बहुत जरूरी था। अवैध कब्जा गिर रहा है, बहुत सही हुआ। पर साहब शिक्षा माफिया का कब्जा किस पर गिरेगा? बड़े-बड़े स्कूल चेन के मालिक पर गोली कब चलेगी? प्राइवेट यूनिवर्सिटी के ट्रस्टी पर बुल्डोजर कब चढ़ेगा? कोचिंग माफिया का बोर्ड कब उखड़ेगा?
योगी जैसा साहस चाहिए तो पूरा चाहिए। आधा साहस से आधा माफिया ही मरेगा। बंदूक वाला माफिया मरेगा तो लोग डरेंगे। डिग्री वाला माफिया मरेगा तो देश सुधरेगा। गरीब किसान से पूछो वो भरोसा किस पर करे। वो कहता है खेत का कर्ज माफ हो जाए तो मैं जी जाऊंगा। पर बेटे का भविष्य बिक जाए तो मैं मर जाऊंगा। खेत सूख जाए तो एक फसल मारी जाएगी। पर स्कूल बिक जाए तो पीढ़ी मारी जाएगी। बुल्डोजर सिर्फ ईंट-पत्थर के अवैध मकान पर नहीं चलता साहब। बुल्डोजर काले कारनामे पर चलता है। शिक्षा बेचने वाली हर दुकान पर चलना चाहिए। फीस लूटने वाले हर गेट पर चलना चाहिए। पेपर बेचने वाले हर गिरोह पर चलना चाहिए। नहीं तो "योगी मॉडल" अधूरा रह जाएगा। सड़क चौड़ी हो जाएगी, पर दिमाग तंग रह जाएगा। बुल्डोजर मेंचलेगा तो मकान गिरेगा जय, पर स्कूल नहीं सुधरेगा। डंका तो बजेगा, पर स्कूल की घंटी नहीं बजेगी। और जिस देश में स्कूल की घंटी नहीं बजती, उस देश का भविष्य सो जाता है।





